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बुधवार, 15 जुलाई 2020

जुलाई 15, 2020

हिंदी कहानी भटकती आत्मा(मंगला की) भाग 5 Wandering soul (of Mangala)

                            हिन्दी कहानी

                 भटकती आत्मा(मंगला की)

           Wandering soul (of Mangala)

                                  भाग 5

मै कल फिर तुम्हारा इंतज़ार करुँगी इतना कह के वो चली गयी थी अमित जोर से चिलाय और चारो तरफ देखा, पर कोई नहीं दिखा,जो कुत्ते भौंक रहे थे वो भी आज चुके थे अमित साईकिल को पकडे हुए पैदल अपने घर पहुँचता है वो घबराया हुआ था घर पहुचते ही माँ ने पूछा कहाँ इतनी देर हो गयी अमित ने कहा कुछ नहीं माँ थोड़ा काम था उसने  माँ से खाना माँगा और खाने के बाद अपने कमरे में चला गया  वो सोने की कोशिश कर रहा था लेकिन उसे सिर्फ कल की चिंता थी यही सोचते सोचते उसकी आँख लग चुकी थी और वो सो गया था।
 दूसरे दिन शाम को 4 बजके 30 मिनट पर वो स्टेडियम पहुँचता था उस दिन भी ठण्ड  बहुत जादा थी पर कोहरा थोड़ा कम था अमित ने स्टेडियम के चारों तरफ नजर घुमाई  पर इक़बाल उसे कही नज़र नहीं आ रहा था अमित ने अपने कोच  से पूछा,सर इक़बाल कहाँ है सर ने कहा इक़बाल तो आज आया ही नहीं ये सुनते ही अमित  परेशान होने लगता है वो दौड़ के साईकिल स्टैंड के पास पहुंचता है और अपनी साईकिल  निकल कर इक़बाल के घर की ओर निकल पड़ता है शाम के 6.00 बज चुके थे अमित तेज़ी से साईकिल चला रहा था इक़बाल के घर से 500 मीटर पहले ही एक रेलवे क्रॉसिंग थी जोकि उस समय बंद थी अमित को घबराहट हो रही थी उस ठण्ड में भी उसके पसीने छूट रहे थे उसे पिछली रात की "मंगला" की बातें याद आ रही थी
अमित सोच रहा था कि क्या सच में मंगला उसका इन्तेज़ार कर रही है।

लगभग 40 मिनट बाद रेलवे क्रासिंग खुलता है क्रासिंग पर बहुत जाम लगा हुआ था किसी तरह अमित उस भीड़ से बहार निकलता है और इक़बाल के घर की तरफ बढ़ता है इक़बाल के घर उस दिन थोड़ी भीड थी उसके कमरे से धुआं
निकल रहा था तभी भीड़ को चीरती हुई अमित को एक आवाज सुनाई देती है शायद वो "मंगला" की आवाज थी इतना सुनते ही ।।.......
    भाग 5 समाप्त।।
  (आगे की कहानी के लिए बने रहिये मेरे साथ)

दिनाँक 15 जुलाई 2020 समय 2.15 दोपहर


 

रचना(लेखक)

                      अमित सागर(गोरखपुरी)



मंगलवार, 14 जुलाई 2020

जुलाई 14, 2020

हिंदी कहानी भटकती आत्मा(मंगला की) भाग 4 Wandering soul (of Mangala)

                           हिन्दी कहानी

                भटकती आत्मा(मंगला की)

         Wandering soul (of Mangala)

                                 भाग 4


अमित के शरीर में  झनझनाहट  सी होने लगी थी वो उठा और घर जाने ही वाला  था कि तभी पीछे से आवाज आई मेरा नाम नहीं पूछोगे अमित पीछे मुड़ता है तभी उसने कहा "मंगला" नाम है मेरा याद रखना अमित के पसीने छूट गये थे इतन ठण्ड में भी, वो अपनी साईकिल की तरफ भागा और घर की ओर चल पड़ता है पीछे से इकबाल आवाज दे रहा था पर अमित ने पीछे मुड़कर नहीं देखा, राहों में धुंध बढ़ चुकी थी ठण्ड भी कुछ ज्यादा थी अमित डर रहा था और उसे महसूस हो रहा था कि कोई उसके साथ चल रहा है उसने साईकिल की रफ़्तार बढ़ाई तभी उसके  साईकिल की चेन उतर जाती है वो साईकिल से नीचे उतर कर चारो तरफ नज़र घूमता है पर उसे कोई नज़र नहीं आता है

उसके हाथ कांप रहे थे और वो साईकिल की चेन को चढाने की कोशिश कर रहा था रास्ता बिलकुल सुनसान था वहां कोई आवागमन नहीं था जिससे  अमित किसी की मदत ले सके, उसने जैसे तैसे चेन को चढ़ाया और साईकिल पर बैठकर आगे बढ़ने लगता है तभी एक काली बिल्ली ने अमित का रास्ता काट दिया था उसने अपनी साईकिल थोड़ी देर के लिए रोक ली थी रात के 11.45 बजे थे ठण्ड बढ़ती जा रही थी 2 मिनट के बाद वो घर को चल पड़ा,उसे अभी भी महसूस हो रहा था कि कोई उसके साथ चल रहा है अचानक से उसकी साईकिल की हवा काम हो जाती  है।

वो साईकिल से नीचे उतरता है और टायर को चेक करता है उसकी साईकिल पंचर हो चुकी थी अमित घबरा रहा था तभी अमित ने देखा दो कुत्ते उसकी तरफ देखकर भौंक रहे थे अमित ने पीछे मुड़के देखा तो कोई नहीं था फिर भी कुत्ते भौंके जा रहे थे उसी वक़्त अमित के चेहरे को एक तेज़ हवा का झोंका छुकर गुज़र ही रही थी तभी उसके कानों में आवाज आयी

     मै "मंगला हूँ" ।।

  भाग 4 समाप्त।(आगे की कहानी के लिए बने रहिये मेरे साथ)

      दिनाँक 08 जुलाई 2020 समय 7.45 शाम

रचना(लेखक)

                     अमित सागर (गोरखपुरी)



   







सोमवार, 13 जुलाई 2020

जुलाई 13, 2020

हिंदी कहानी भटकती आत्मा(मंगला की)भाग 3 Wandering soul (of Mangala)

                          हिन्दी कहानी

             भटकती आत्मा(मंगला की)

Wandering soul (of Mangala)

उसकी आंखें देख अमित थोड़ा डर सा गया था तभी उसने आँखों से अमित को अन्दर आने का इशारा किया, अमित ने हाथों में पकडे हैंडबाल को नीचे रख दिया और वो कमरे के दवाजे तक पहुँचा ही था कि अन्दर से आवाज आई The door is open come in इतना सुनते ही अमित के शरीर में झनझनाहट हुई और उसके शरीर के रोएँ खड़े हो गए थे 
सर्दी में भी उसके माथे पर पसीना दिख रहा था  बात चौकाने वाली  ये थी की इक़बाल की बहन रज़िया बिलकुल भी पढ़ी लिखी नहीं थी और इसी बात ने अमित के रोंगटे खड़े कर दिए थे।
अमित ने जूते निकले और कमरे के अन्दर प्रवेश करता है और नीचे बैठने वाला ही था कि रज़िया ने बड़ी बड़ी आँखे दिखाते हुए अमित से कहती है" Come here and sit here" अमित इक़बाल के अब्बा की तरफ देखता है तभी इक़बाल के अब्बा अमित से बैठ जाने को कहते है और अमित रज़िया के सामने बैठ जाता है तभी अमित इक़बाल के अब्बा से पूछता है क्या हुआ इसे इक़बाल के अब्बा कहते है इसके ऊपर किसी बुरी आत्मा का साया है तभी रज़िया जोर से चीखती है और कहती मै बुरी आत्मा नहीं हूँ कह कर बेहोश हो जाती है आत्मा रज़िया का शरीर छोड़ चुकी थी रज़िया की आँखे खुलती है  उसका सिर भारी लग रहा था और वो सभी को  देखकर हैरान थी  वो अमित से पूछती है भाई आप कब आये अमित ने कहा  थोड़ी देर पहले ही आया हूँ ।  
अमित ने रज़िया से पूछा तुम ठीक तो हो ना ,हाँ मै  ठीक हूँ मुझे क्या हुआ रज़िया ने कहा,अमित ने मजाक में पूछा तुम तो अंग्रेजी तो बहुत अच्छा बोल लेती हो रज़िया हँसते हुए भाई क्यों मज़ाक कर रहे हो अमित ने कहा मैं सच कह रहा हूँ अचानक से रज़िया की आवाज बदली और आँखे बड़ी हुई  फिर उसने अमित से कहा तुम सही कह रहे हो..।।

     भाग 3 समाप्त
  (आगे की कहानी के लिए बने रहिये मेरे साथ)
     दिनाँक 7 जुलाई 2020  समय  9.45 शाम

रचना(लेखक)

अमित सागर(गोरखपुरी)

शनिवार, 11 जुलाई 2020

जुलाई 11, 2020

हिन्दी कहानी भटकती आत्मा(मंगला की) भाग 2 Wandering soul (of Mangala)

               हिन्दी कहानी

         भटकती आत्मा(मंगला की)

  Wandering soul (of Mangala)

                        भाग 2

दोनों ने दरवाजा खोलने की कोशिश की लेकिन दरवाजा अन्दर से बंद था इक़बाल ने दरवाजे का कुंडा खड़खडाय कुछ देर बाद इक़बाल के अब्बा ने दरवाजा खोला कमरा धुएं से भरा हुआ था शायद इक़बाल के अब्बा ने अन्दर लोहबान सुलगाया हुआ था उसी का धुआं कमरे में फैला हुआ था तभी अमित की नज़र कमरे के अन्दर पड़ती है और उसे धुएं के बीच एक लड़की बैठी हुई नज़र आती है ये लड़की कौंन थी धुएं की वजह से पता नहीं चल रहा था उस लड़की के बाल खुले हुए थे और वो एक चिराग के सामने बैठ के झूम रही थी अमित ने इक़बाल से पूछा ये कौन है इक़बाल ने कहा यार ये छोटी बहन रज़िया है जिसे तू प्यार से रजो कहता है।
अमित ने कहा अच्छा, धुंध से कुछ दिख नहीं रहा था इक़बाल ने कहा हाँ मुझे भी कुछ ठीक से नहीं दिख रहा है तभी अन्दर से चिल्लाने  की आवाज सुनाई देने लगी,ये इक़बाल के अब्बा की आवाज थी और वो रज़िया से कुछ पूछ रहे थे और रज़िया जोर जोर से चीख और चिल्ला रही थी अन्दर से मोगरे की खुशबु आ रही थी शायद इक़बाल के अब्बा ने अगरबत्ती सुलगाई थी चारो तरफ मोगरे की खुशबु फैली हुई थी अंदर क्या हो रहा था उन्हें कुछ  पता नहीं चल रहा था और वो दोनों थोड़ा घबरा रहे थे
 शाम के 7.15 मिनट का समय हो चूका था  ठण्ड बढ़ चुकी थी और उस दिन कोहरा कुछ ज्यादा ही था  अमित को घर भी जाना था पर उसे थोड़ी देर हो गयी थी अमित ने इक़बाल से कहा मुझे अब चलना चाहिये रात होने वाली है इक़बाल ने कहा हाँ ठीक है चलो मै रोड तक तुम्हारे साथ चलता हूँ हाथ में हैंडबाल पकडे अमित ने कहा चलो फिर चलते है इतना कहते ही कमरे का दरवाजा अपने आप खुल जाता है कमरे का धुआं दोनों के चहरे को छूकर बहार निकल जाती है और कमरे से दो चमकती हुई आँखे अमित को देख रही थी।

       भाग 2 समाप्त।।

 (आगे की कहानी के लिए बने रहिये मेरे साथ)

  दिनाँक 11 जुलाई 2020 समय 6.13 शाम

        रचना(लेखक)

        अमित सागर(गोरखपुरी)


शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

जुलाई 10, 2020

हिंदी कहानी भटकती आत्मा(मंगला की) भाग 1 (Wandering soul (of Mangala)

               हिन्दी कहानी

        भटकती आत्मा(मंगला की)

 (Wandering soul (of Mangala)

                         भाग 1


 तारीख   9 जनवरी 1991

 समय  -  शाम के 4.15 मिनट

 स्थान-   गोरखपुर(उत्तर प्रदेश) भारत

 दोस्त-    अमित, इक़बाल ,मंगला और

 इक़बाल की बहन( रज़िया)


 शाम के 3.45 का समय था अमित अपने पिता जी से कहता है कि मैं स्टेडियम जा रहा हूँ ,पिता जी ने कहा जल्दी लौटना आज ठण्ड बहुत है अमित ने अच्छा पिता जी,कह कर अपनी साईकिल उठाई और स्टेडियम की ओर चल दिया,स्टेडियम की दुरी अमित के घर से 5 किलोमीटर थी और वो शाम के 4 बजके 15 मिनट पर स्टेडियम पहुँचा था चारो तरफ मैदान में कोहरा छाया हुआ था।
 अमित बास्केटबॉल कोर्ट की तरफ बढा ही था की  कोर्ट पर अमित की मुलाकात इक़बाल से होती है इक़बाल हैंडबाल का एक अच्छा खिलाडी था और वो अमित से पूछता है तुम किस खेल से हो, अमित कहता है किसी खेल से नहीं पर मुझे बास्केटबॉल खेलना है तभी इक़बाल  अमित से कहता तुम मेरे साथ हैण्डबाल खेलो और अमित मान जाता है ।
 इक़बाल का घर स्टेडियम और अमित के घर के बीच में रेलवे कालोनी के अन्दर था खेल से हुई  अमित और इक़बाल की मुलाकात दोस्ती में बदल गयी थी और इनकी दोस्ती पुरे स्टेडियम में मशहूर थी ये दोनों  हैंडबॉल के बेहतरीन खिलाडी थे हर रोज शाम को खेल ख़त्म होने के बाद अमित इक़बाल के घर जाया करता था और हर रोज चाय नास्ता कराने के बाद ही इक़बाल , अमित को घर जाने देता था इक़बाल को अमित के घर की आर्थिक स्थिति मालूम थी और वो अमित की बहुत मदत करता था अमित और इक़बाल की दोस्ती को तक़रीबन 5 साल हो चुके थे। 
 एक दिन अचानक साल 1996 तारीख 28 दिसम्बर शाम के 6.14 मिनट और दिन शनिवार था अमित और इक़बाल स्टेडियम से घर लौट रहे थे  अमित को उस दिन जल्दी घर पहुंचनात था लेकिन इक़बाल ज़िद करने लगता है कि घर चाय पीकर जाना ,दोनों अपनी साईकिल घुमा लेते है घर पहुंचते ही इक़बाल के कमरे से धुंआ निकलता देख दोनों कमरे की तरफ दौड़ते है।।


 भाग 1 समाप्त।।


 (आगे की कहानी के लिए बने रहिये मेरे साथ)

 दिनाँक  07 जुलाई 2020  समय  4.53 शाम

 

 रचना(लेखक)

 अमित सागर(गोरखपुरी)



गुरुवार, 9 जुलाई 2020

जुलाई 09, 2020

हिन्दी कहानी घूँघट(अनदेखा रिश्ता) अंतिम भाग Veil(undiscovered relationship)

               हिन्दी कहानी

               घूँघट(अनदेखा रिश्ता)

       Veil(undiscovered relationship)

                    अंतिम भाग 

रोशनी और रोहन को साथ रहते हुए  एक महीने हो चुके थे उधर अंकित और रचना को भी एक महीने हो चुके थे शाम का समय था अंकित और रोहन की  माँ ने रचना और रोशनी को शाम की चाय के लिए नीचे बुलाया दोनों नीचे आये और  शाम की चाय के साथ दोनों की माँ ने रचना और रोशनी से कहा कि कल सुबह तुम्हारे घर से माँ और पिता जी आ रहे है।
 तुम्हे वो अपने साथ लेने आ रहे है और तुम्हे जाना होगा, इतना सुनता ही अंकित ,रचना और रोहन ,रोशनी के चेहरे पर मायूसी छा जाती थी तभी रचना और रोशनी अपने कमरे की ओर आँखों में ढेर सा आँशु लिए चली जाती है दोनों घरों में शांति फ़ैल हुई थी
सुबह 7.30 मिनट हुए थे अंकित की माँ ने अंकित के कमरे का दरवाजे खटखटाया दरवाजा अन्दर से खुला हुआ था।
उन्होंने दरवाजे को धक्का दिया और अन्दर की तरफ बढ़ी अन्दर जाते ही ओ जोरों से चिल्लाई घर के सभी सदस्य      
दौड़कर कमरे की तरफ बढे तो देखा की अंकित और रचना ने पंखे से लड़के कर अपनी जान दे दी थी शायद वो दोनों समाज के रूढ़िवादी विचारों से लड़ ना सके और एक दूसरे के लिए अपनी जान दे दी,वही दूसरी और रोहन और रोशनी ने समाज से लड़ के अपने जीवन को आगे बढ़ाया और दोनों एक दूसरे के साथ बहुत खुश थे।।

   कहानी समाप्त।।

दिनाँक 04 जुलाई 2020 समय 2.12 दोपहर

रचना(लेखक)

                     अमित सागर(गोरखपुरी)




मंगलवार, 7 जुलाई 2020

जुलाई 07, 2020

हिन्दी कहानी घुँघट(अनदेखा रिश्ता) भाग 5 Veil(undiscovered relationship)

                   हिन्दी कहानी

                    घूँघट(अनदेखा रिश्ता)

            Veil(undiscovered relationship)

                भाग 5

भीड़ से निकल कर दोनों गलती से एक दूसरे की पत्नी का हाथ पकड़ते है अंकित ने रचना का हाथ पकड़ा और रोहन ने रोशनी का हाथ पकड़ा और यहीं से इनकी पत्नियां एक दूसरे के साथ एक्सचेंज हो  जाती है अंकित और रोहन के घर पर  तो अफरा तफरी मची हुई थी पर रोशनी और रचना की हालत भी कुछ ठीक नहीं थी दोनों घबराई और सहम सी गयी थी।
अंकित और रोहन जैसे अपने कमरे में जाते है तभी रचना, अंकित से और रोशनी, रोहन से लिपट के रोने लगती है उन्हें देखकर अंकित और रोहन की भी आँखे आँसुओं से भर जाती है वो उन्हें बहुत समझते है  अंकित और रोहन की माँ भी बहुत परेशान है उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था की वो क्या करें तभी उनके मन में ख्याल आता है और वो बहू के कमरे में जाती है लेकिन बहू को रोता देख उसे गले लगा लेती है अंकित और रोहन की माँ अपनी बहू से पूछती है की क्या तुम अपने घर जाना चाहती हो, रचना और रोशनी दोनों अंकित और रोहन की तरफ देखती है और उनके आँखों से आशुओं की बरसात होने लगती है माँ समझ जाती है कि दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करने लगे है।

रचना और रोशनी को कोई फर्क नही पड़ रहा था कि ओ किसके साथ है क्योंकि शादी तो उनकी ऐसे इंसान से हुई
 थी जिसे उन्होंने कभी देखा तक नहीं था लेकिन अब ,रचना
अंकित के साथ और रोशनी, रोहन के साथ बहुत खुश थी।
लेकिन हमारे रूढ़िबदी समाज में प्यार की कोई जगह नही है
आखिर कर अंकित और रोहन की माँ ने रोशनी और रचना के घर का पता लगा ही लिया और उनके माता पिता से बात करके रचना और रोशनी को उनके उस पति के हवाले सौपना चाहती थी जिसे उन्होंने कभी देखा ही नहीं था और जिसे पहली बार देखा और प्यार हो गया वो उनके पति नहीं थे फिर भी वो दोनों बहुत खुश थी और इनही के साथ जीना और मारना चाहती थी और यही हुआ ।

  भाग 5 समाप्त।।   
  (आगे की कहानी के लिए बने रहिये मेरे साथ)

 दिनाँक 07 जुलाई 2020 समय 7.30 शाम

रचना(लेखक)

अमित सागर(गोरखपुरी)



रविवार, 5 जुलाई 2020

जुलाई 05, 2020

हिन्दी कहानी घुँघट(अनदेखा रिश्ता) भाग 4 Veil(undiscovered relationship)

                   हिन्दी कहानी                              घूँघट(अनदेखा रिश्ता)   

      Veil(undiscovered relationship)

                          भाग 4

तभी अंकित और रोहन दौड़ कर अपनी माँ के पास पहुँचते है दोनों की माँ एक टक दुल्हन को देख रही थी अंकित और रोहन ने अपनी माँ से पूछा क्या हुआ, माँ  दुल्हन की तरफ इशारा करके बोली ये कौन है अंकित ने कहा ये हमारी पत्नी
रोशनी है और रोहन ने भी अपनी माँ से कहा ये मेरी  पत्नी रचना  है माँ ने जोर से चिल्ला के कहा ये तुम्हरी पत्नी है तो वो कौन थी जिससे तुम्हारी शादी करवाई थी।

अंकित और रोहन अपने माँ से कहते है माँ ये वही तो है जिससे आपने शादी कराई थी शादी के बाद से ये मेरे पास ही है माँ भी सोच में पड जाती है अंकित, रोशनी और रोहन ,रचना भी एक दूसरे को बहुत प्यार करने लगे थे।
 (कभी कभी हम पुरानी परम्पराओं और रीती रिवजों में इतना  उलझ जाते ही क्या गलत है क्या सही  हम सोच ही नहीं पाते)
अगर अंकित ने रोशनी को  और रोहन ने रचना  को देखा  होता तो ये गलती कभी नहीं होती।
मुझे लगता है कि आप को अभी भी समझ नहीं आया,की माँ सही कह रही है या गलत कह रही है।

माँ बिलकुल सही कह रही थी बात 21 नवम्बर 1998 की है जब अंकित और रोहन अपनी पत्नी के साथ अहमदबाद रेलवे स्टेशन पर पेलेटफार्म नम्बर 2 और 3 पर बैठे थे और वो अपने बुआजी के घर जा रहे थे अंकित और रोहन पानी की बोतल और खाने का सामान लेने गए थे दोनों की ट्रेन पेलेटफार्म पर खड़ी थी और केवल 1 मिनट का समय शेष बचा था पेलेटफार्म पर भीड़ बहुत थी और इसी एक मिनट में इन दोनों की ज़िन्दगी बदल दी।।

      भाग 4 समाप्त।।
    (आगे की कहानी के लिए बने रहिये मेरे साथ)

दिनाँक 05 जुलाई  समय 10.55 सुबह

       

रचना(गोरखपुरी)

                  अमित सागर(गोरखपुरी)

         



          

शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

जुलाई 03, 2020

हिन्दी कहानी घुँघट(अनदेखा रिश्ता) भाग 3 Veil (undiscovered relationship)

                हिन्दी कहानी

               घूँघट(अनदेखा रिश्ता)                     Veil(undiscovered relationship)

                           भाग 3

 तभी बुआ जी की आवाज सुनाई देती है और वो शाम की चाये के लिए बुला रही थी तभी अंकित और रोहन बिना अपनी पत्नी को देखे ही शाम की चाये के लिए चले जाते है।
मुम्बई में अंकित की बुआजी और भुज में रोहन की बुआजी ने शाम के चाये के साथ दुल्हन की मुह दिखाई के लिए कुछ कपडे और जेवर लेकर बैठी थी अंकित और रोहन की बुआ जी ने उनसे कहा का दुल्हन का घुँघट हटाओ ,अभी अंकित और रोहन घबराते हुए घुँघट को हटाते है।
 घुँघट हटाते ही दोनों का चेहरा देखने लायक था वो दोनों मन ही मन बहुत खुश थे और उनकी आंखें अपनी पत्नियों के चेहरे से हट नहीं रही थी तभी बुआजी ने कहा अब बस भी करो कितना देखोगे पूरी उम्र पड़ी है देखने के लेकिन
बुआजी को उनकी खुशी का अंदाज़ा नहीं था तभी बुआजी 
ने उन्हें हटाया और दुल्हन के पास बैठी और मुँह दिखाई की  
 रस्म को पूरी की और कहा तुम्हारी जोड़ी हमेशा बनी रहे और सच में ये जोड़ी  हमेशा बनी रही।

आगे क्या होने वाला है किसी को कुछ पता नहीं था। अंकित और रोहन एक हप्ते तक अपनी पत्नियों के साथ खूब मौज मस्ती करते है और फिर उनका वापस अपने घर लौटने का  समाये नजदीक आ जाता है और वो अपने अपने घर अहमदाबाद लौट जाते है दोनो जोड़ियां एक दूसरे को बहुत प्यार करने लगते है।

 घर पहुचते ही अंकित और रोहन की माँ अपनी बहू को उसके कमरे में ले जाती है और कहती है कि थोड़ा आराम करलो फिर बातें करते है थोड़ी देर बाद अंकित और रोहन की माँ चाये लेके कमरे का दरवाजा को खड़ खड़ाती है दोनों दुल्हने दरवाजा खोलती है तभी अंकित और रोहन की माँ जोर से चीखती है और चाये का प्याला उनके हाथों से गिर जाता है।। 

                               भाग 3 समाप्त।।
           (आगे की कहानी के लिए बने रहिये मेरे)

        दिनाँक 1 जुलाई2020  समय 6.40 शाम

                                रचना(लेखक)

              अमित सागर(गोरखपुरी)



बुधवार, 1 जुलाई 2020

जुलाई 01, 2020

हिन्दी कहानी घुँघट (अनदेखा रिश्ता) भाग 2 Veil

                         हिन्दी कहानी

                 घुँघट(अनदेखा रिश्ता)  Veil(Undiscovered Relationship)

                         भाग 2

        
दोनों दुल्हन परेशान होने लगी थी तभी उनके पति  हाथों में पानी का बोतल और खाने का सामान लिए दौड़ते हुये उनके पास पहुचे और जल्दी से अपना लगेज उठाया और जैसे ही अपने ट्रेन के कोच  चढ़े  ट्रेन चल पड़ी,दोनों अपने अपने बर्थ पर जा कर बैठ गए।
इन दोनों शादीशुदा जोड़ियों की शादी को केवल एक ही दिन हुए थे और अगली दिन सुबह ही ये अपने अपने रिश्तेदार के घर जा रहे थे और इनमे से किसी ने भी अपने पति या पत्नी का चेहरा अभी तक नहीं देखा था ।
अगले दिन 12 घण्टे का सफर करने के बाद दोनों अपने अपने अपने रिश्तेदार के घर पहुंचे,दरवाजे पर उनका स्वागत किया गया और उनकी पूजा की गयी फिर घर में प्रवेश कराया गया, दोनों दुल्हन ने अपने अपने बुआजी के पैरों को झुक कर छुती है और आशीर्वाद लेती है बुआजी इनकी शादी में नहीं पहुच पायी थी हैरानी की बात ये थी की अभी तक दोनों दुल्हन घूँघट में ही थी सभी ने चाये पी,थोड़ी देर बाद बुआ जी के उन्हें उनका कमरा दिखाया और कहा की तुम दोनों थक गए होंगे थोड़ा आराम कर लो शाम को आराम से बैठ के बातें करेंगे और वो अपने कमरे में चले गये।
अंकित और रोहन दोनों  ने अभी तक अपनी पत्नी का चेहरा नहीं देखा था और देखने के लिए बेक़रार थे जैसे ही दोनों कमरे में जाते है और जाते ही अपने पत्नी से पुछते है कि क्या मैं आपका घुँघट हटा के आपको देख सकता हूँ पत्नी धीरे से सिर को हिला के उन्हें इज़ाज़त देती है दोनों घबराते हुए घुँघट को उठाने जाते है तभी।।

                           भाग 2 समाप्त

    (आगे की कहानी के लिए बने रहिये मेरे साथ)

             दिनाँक 30 जून 2020  समय 09.50

                             रचना( लेखक)

                        अमित सागर(गोरखपुरी)

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