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शुक्रवार, 10 दिसंबर 2021

दिसंबर 10, 2021

दलित हिंदी कविता | अछूत पर हिंदी कविता | poem on The Untouchables | पिछड़ी जाति पर कविता | दलितों पर कविता | दलितों पर अत्याचार पर कविता | सागर गोरखपुरी

                                      दलित

शिक्षित है पर क्यूँ  तुमने उन्हें सम्मान न दिया।
दलित हैं तो तुमने उन्हें अछूत जैसा नाम दिया।।

सब कुछ किया है तुम्हारी खातिर बत से बत्तर काम किया।
मल मूत्र मवेशियों का, तुम्हारा घर भी उन्होंने साफ किया।
बैलगाड़ी के बैल बने वो, तो कभी चरवाहों का काम किया।
देने को तुमने दिया उन्हें क्या, इस पर तुमने क्या कभी गौर किया।
दलित हैं तो तुमने उन्हें अछूत जैसा नाम दिया।।
पानी छीना माटी छीनी उन्हें अनाजों से मरहूम किया।
इन पर तुम्हारा हक़्क़ नही फिर भी पूरा अधिकार किया।
शिक्षा तो तुम्हारी नही थी पर इससे भी उन्हें मोहताज किया।
उनकी हर चीजों पर बस तुमने अपना अधिकार किया।
दलित हैं तो तुमने उन्हें अछूत जैसा नाम दिया।।

झुके नही न थके कभी वो कदम को अपने रुकने न किया।
सहकर हर ज़ुल्म तुम्हारी एक नया इतिहास लिख दिया।
वर्ण व्यवस्था ऐसी थी कि ईश्वर को भी अपना बता दिया।
छोड़ा क्या उनके हिस्से में इस पर क्या कभी ज़िक्र किया।
दलित हैं तो तुमने उन्हें अछूत जैसा नाम दिया।।
बात करते हो समानता की, क्या बराबरी में कभी उन्हें सम्मान दिया।
कॉप्टिशन में जीते ही नही, हार को अपने आरक्षण का नाम दिया।
नाकाम रहे तुम हर जगह इसका कारण भी उन्हीं को बता दिया।
वो डरे नही बस आगे बढ़े और एक अनोखा संबिधान लिख  दिया।
दलित हैं तो तुमने उन्हें अछूत जैसा नाम दिया।।

हर तख्त पर बिराजमान सिर्फ तुम ही तो थे।
फिर भी उन्हें तुमने रेंगने पर मजबूर कर दिया।
देश असल में जिनका है उन्हें रोने पर मजबूर किया।
तुम हार न जाओ इस डर से तुमने उन्हें रौंद दिया।
दलित हैं तो तुमने उन्हें अछूत जैसा नाम दिया।।

दिनांक 07 दिसंबर 2021                                समय  14.20
                                                रचना(लेखक)
                                               सागर गोरखपुरी


शनिवार, 2 अक्तूबर 2021

अक्तूबर 02, 2021

निगाहों की जुबां | लव कविता इन हिंदी | प्यार पर कविता | रोमांटिक कविता इन हिंदी | पहला प्यार पर हिंदी कविता | सागर गोरखपुरी की कविताएँ |

                            निगाहों की जुबां

पकड़ के मेरा हाथ मुझ पर यक़ीन तो कर ले।
ताउम्र नही कहता,  कुछ दूर तलक ही चल ले।
निगाहों की जुबान नही आती मुझे सच है ये।
मेरे दिल की धड़कनों से तु अपनी हर बात पुछ ले।।

खत में लिखे अल्फाजों के मायने बदल जाते हैं।
मैसेज में कहीं बातों के जज़्बात बदल जाते हैं।
निगाहों की जुबान नही आती मुझे सच है ये।
मेरे दिल के धड़कनों से तु अपनी हर बात पूछ लें।।
जिस मंजिल को ढूंढता था कभी, शायद तुम वही हो।
जिसके दुपट्टे में उंगलिया फंसा कर ज़िंदगी गुज़र जाये शायद तुम वही हो।
जिसके सपने मैंने भोर तलक देखे हैं शायद तुम वही हो।
सोचता हूँ हर बात तुसे आज कह दूं पर कैसे।
निगाहों की जुबान नही आती मुझे सच है ये।
मेरे दिल के धड़कनों से तु अपनी हर बात पूछ लें।।

लङकप्पन की वो सारी नादानियां चाहता हूँ।
छूट गए जो सपने उन्हें तेरे संग जीना चाहता हूँ।
तेरे इर्द गिर्द आवारा हवाओं सा घूमना चाहता हूँ।
तेरी नीदों में हर रोज मैं जागना चाहता हूँ।
निगन्हों की जुबान नही आती मुझे सच है ये।
खामोश रहकर भी हर बात तुझसे कहना चाहता हूँ।।
तुझी से हर सुबह हो मेरी सांझ भी तुझसे हो ।
उथल पुथल हो चाहे ज़िंदगी, पर तेरे संग आराम सा हो।
बैठी रहे तु संग मेरे बांहों में डाले हाथ।
तेरी आँखों के समंदर में डुब कर हो जाये शाम।
कुछ ख्वाब अधूरे है मेरे जो तेरे संग मुझे जीने हैं।
निगन्हों की जुबान नही आती मुझे सच है ये।
मेरे दिल के धड़कनों से तु अपनी हर बात पूछ लें।।

             दिनाँक 25 सितंबर 2021    समय  9.30 सुबह
                                                 रचना (लेखक)
                                                सागर गोरखपुरी


रविवार, 19 सितंबर 2021

सितंबर 19, 2021

इश्क़ | Love poems | इश्क़ पर हिंदी कविता | प्यार पर कविताएँ | प्यार हिंदी कविता | सच्चे प्यार पर कविता | इश्क़/ सागर गोरखपुरी

                                         इश्क़

अभी तलक तुम मेरे आस-पास रहती है।
तु हवाओं की तरह मुझे छुकर गुज़र जाती है।
तेरी वफ़ा की खुशबू मेरे सांसो में इस क़दर बसी है
कमबख्त जिस्म से अब तो जान भी नही निकलती है।।

तु ना होकर भी मेरे क़रीब हर पल रहती है।
कभी बुझे ना जो ऐसी प्यास जैसी तु लगती है।
ज़िंदगी के सफर जो खालीपन छोड़ दिया है तुमने।
उन्हें याद कर कितनी रातें मेरी जागकर गुज़र जाती है।।
उन यादों को लिए किसी समन्दर में मैं डुब जाऊँ।
या फिर किसी किनारे पे बहकर मैं तुझे भूल जाऊँ।
जिस्म से अब तो जान भी नहीं निकलती है।
तू ही बता किस तरह मैं तुझे भूला जाऊँ।।

तेरी हर अदा को शायद अब मैं समझता हूँ।
तेरी निगाहों की जुबान भी मैं जानता हूँ।
कुछ कहता नही तुझसे ये फितरत है मेरी।
तेरी धड़कनों की हर आहट मैं महसूस करता हूँ।।
कभी मिल भी सकेंगे हम लहरों की तरह।
या फिर छुट जाएंगे हाथों से रेत की तरह।
ये फैसला भी अब तो तक़दीर पर है।
तुझसे आस लगाना भी मैंने छोड़ दिया।।

           दिनाँक 18 सितंबर 2021   समय  11.00 सुबह
                                                 रचना(लेखक)
                                                सागर गोरखपुरी

गुरुवार, 19 अगस्त 2021

अगस्त 19, 2021

चाहे जान मेरी ये | हिंदी देश भक्ती कविता/सागर गोरखपुरी | सैनिकों पर कविता | poem on soldiers | 26 जनवरी पर कविता | patriotism Poem |

                              चाहे जान मेरी ये

तेरे लिए क़ुर्बान हो जाऊं लहू का हर कतरा ये कहता हैं
देखकर दुश्मन शरहद पर खून जिश्म में खौलता है।
शान तिरंगे के खातिर कितनी रातें हमने गवाँई है
ऐसे ही झूमें तू सदा गगन में चाहे जान हमारी ये रहे ना रहे।।

हर बार जिऊँ मैं तेरे लिये सौ बार तुझपे ही मर जाऊं।
जन्मा हूँ मैं जिस माटी में उस माटी में ही मिल जाऊं।
तू ऐसे ही खुश हाल रहे अवाद रहे है दुआ मेरी।
ऐसे ही झूमें तू सदा गगन में चाहे जान हमारी ये रहे ना रहे।।
कभी लिपट भी जाऊं मैं तिरंगे से मेरे घर तक मुझे तुम ले जाना।
निहारती है माँ राहें मेरी एक बार उससे मुझे तुम मिला देना।
अब ना लौट सकूंगा रक्षाबन्धन में मेरी बहनों से ये बता देना।
दुनियाँ है मेरी वो छोटी सी मेरे भाई से जाकर ये कह देना।
उस गली चौबारे उन गलियों में हर जगह मुझे तुम घूमा देना।
मैं खेला हूँ जिस मिट्टी में उस मिट्टी में ही सुला देना।
अवाद रहे वो गांव मेरा चाहे जान मेरी ये रहे ना रहे।।

जो शहिद हुआ तेरे अस्मत पर तुझे छोड़ कहीं ना जाऊंगा।
गर थम गयी जो सांसे मेरी ज़िंदा मैं फिर लौट आऊंगा।
तुझसा कहाँ है इस जहां में कोई, माँ तुझसी कहाँ मिल पायेगी।
आबाद रहे तू सदा दिलों में चाहे जान मेरी ये रहे न रहे।। 
तेरी माटी को कोई छू सके इतनी कहाँ किसी में ज़ुर्रत है।
झूका सके जो तुझे ज़मीन पर इतनी कहाँ किसी में हिम्मत है।
अपने लहू से सींचा है इस गुलिस्ताँ को हमने।
 तेरी शरहद की निगहवान है आँखें।
आबाद रहे तू सदा दिलों में चाहे जान मेरी ये रहे न रहे।।

            दिनाँक 15 अगस्त 2021     समय 6.00 सुबह
                        
                                                   रचना (लेखक)
                                                 सागर (गोरखपुरी)

शुक्रवार, 13 अगस्त 2021

अगस्त 13, 2021

क्यूँ डूब जातें हैं | LOVE POEM | प्रेम कविताएं | Poem On Why do you dip| प्यार पर हिंदी कविता | यादों पर कविता | लव कविता / सागर गोरखपुरी

                                 क्यूँ डूब जातें हैं

लड़खड़ाते हैं कभी हवाओं में झूम जातें है।
पांव रखते है जमीन पर और बहक जाते है।
कतरा कतरा जाम हर शाम हम छलकाते है।
नशे में रहकर भी तेरे खयालों में क्यूँ डूब जाते है।।

तेरे तस्वीर को यूँ ही बेवजह निहारते हैं।
यादों के भवँर में जाने कितने अश्क बाह जाते हैं।
ढलती सांझ में उलझने के सैलाब बन जाते है।
नशे में रहकर भी तेरे खयालों में क्यूँ डूब जाते है।।
तेरा ज़िक्र लबों पे जब भी आये, कहीं खो जाता हूँ।
बेचैनियां इतनी बढ़ती हैं मैं पागल हो जाता हूँ।
हर दिन हर शाम अब तो मैखाने में गुजरती है।
नशे में रहकर भी तेरे खयालों में क्यूँ डूब जाते है।।

तेरा फिक्र तेरा ख्याल मुझमे कहीं ज़िंदा है।
करवटें जब भी लेता हूँ तु आंखों से बहता है।
वक़्त के साथ मैं भी ढल जाना चाहता हूँ।
तेरे आगोस में आके सो जाना चाहता हूँ।
यकीन कर मेरा तुझमें ही ठहर जाना चाहता हूँ।
फुर्सत के उन लम्हों में खो जाना चाहता हूँ।
यही ख्वाहिश लिए कदम मधुशाला की ओर बढ़ जाते हैं।
नशे में रहकर भी तेरे खयालों में क्यूँ डूब जाते है।।
एक तू ही तो हैं जिसके बैगैर सांसे कहाँ चलती हैं।
कोरे कागज पर अब मेरी कलम नही लिखती हैं।
तेरी यादों को मिटाने हर शाम मैखाने पहुंच जाते हैं।
नशे में रहकर भी तेरे खयालों में क्यूँ डूब जाते है।।

          दिनाँक 12 अगस्त 2021      समय  10.00 सुबह
                                                   रचना (लेखक)
                                                 सागर (गोरखपुरी)


शनिवार, 24 जुलाई 2021

जुलाई 24, 2021

ये मुमकिन नही | Love Poem | हिंदी लव कविता | पतंगों पर कविता | प्यार पर हिंदी कविता | Poem on This is not possible | लव कविता / सागर गोरखपुरी

                            ये मुमकिन नही

तू मेरी मदहोश पतंग मैं तेरा डोर बन जाऊंगा।
तू बहके जिस तरफ उस ओर मुड़ जाऊंगा।
अपने खयालों की चरखी में ऐसे समेट लूंगा तुझे।
आहिस्ता आहिस्ता मैं तुझमें ही उलझ जाऊंगा।।

लड़े जब भी तू, मांझा तेरा मैं बन जाऊंगा।
कट भी जाये अगर तू, तेरी ओर दौड़ जाऊंगा।
लूट ले तुझे कोई ये मुमकिन ही नही है।
इतनी तेज दौडूंगा की तुझ तक पहुँच जाऊंगा।।
तेरी उँचाइयों से मुझे कोई गिला नही बस डर जाता हूँ।
हाथों से तू कहीं छुट ना जाए मैं यही सोचता हूँ।
डर लगता है बस मुझे उन तेज़ हवाओं से ।
तु हालात से टकराकर कहीं टूट तो नही जाएगी।
लूट ले तुझे कोई ये मुमकिन ही नही है।
इतनी तेज दौडूंगा की तुझ तक पहुँच जाऊंगा।।

बलखाती लहरों की तरह तू हवा में लहराती है।
जरा सी डोर जो खींच लूं, तो नखरें तू दिखती है।
हर पल मेरी नज़रें बस तुझे ही निहारती है।
उँची उड़ान में डोर थोड़ी खीच सी जाती है।
लूट ले तुझे कोई ये मुमकिन ही नही है।
इतनी तेज दौडूंगा की तुझ तक पहुँच जाऊंगा।।
ढलते शाम के साथ धड़कने भी बढ़ जाती है।
तू सितारों में जैसे कहीं छिप सी जाती है।
तेज़ खींच लूं तुझे अपने हाथों से ये सोचता हूँ।
डर जाता हूँ कहीं तु टूट तो नही जायेगी।
लूट ले तुझे कोई ये मुमकिन ही नही है।
इतनी तेज दौडूंगा की तुझ तक पहुँच जाऊंगा।।

                   दिनाँक  23 जुलाई 2021  समय  11.00 रात
 
                                                 रचना (लेखक)
                                               सागर (गोरखपुरी)



रविवार, 11 जुलाई 2021

जुलाई 11, 2021

मेरे आँगन की मिट्टी से | From my courtyard | गाँव पर हिंदी कविता | कविता गाँव मिट्टी पर कविता | Poem on villege | गाँव की मिट्टी/ सागर गोरखपुरी

                      मेरे आँगन की मिट्टी से

यक़ीन कर थाम मेरी उंगली मेरे घर तक तो चल ले।
वहाँ की सरसराती हवाओं से तु इश्क़ तो फ़रमा ले।।
मैं छोड़ चला आऊंगा उस दरीचे को जहाँ मैं जन्मा।
एक बार मेरे आँगन की मिट्टी से तू मुलाक़ात तो कर ले।।

तेरे धूल और धुएं भरे शहर से तो मेरा गाँव बहुत अच्छा है।
शुकून और ताजगी का वहाँ एहसास अभी भी ज़िंदा है।
मैं फिर भी सब छोड़  चला आऊंगा जो कुछ भी मेरा है।
एक बार मेरे आँगन की मिट्टी से तू मुलाक़ात तो कर ले।।
जो तस्वीर बना रखी है मेरे गाँव की तू ने अपने आँखों में।
ऐसा दिखता ही नही मेरा गाँव जैसा तुम समझती है।
बगीचे की घनी छाँव, कुंए का ठंडा पानी, माँ के हाथ की वो चाय मैं सब छोड़ आऊंगा।
एक बार मेरे आँगन की मिट्टी से तू मुलाक़ात तो कर ले।।

तु कहती है आशियाँ नही बनाना वहाँ, कहीं और बस जाना है।
तुम्हे क्या पता कितनी शिद्दत से उस आशियाँ को मैंने बनाया है।
मैं सब छोड़ चला आऊंगा जो यादें वहाँ की मैंने समेट रखी है।
एक बार मेरे आँगन की मिट्टी से तू मुलाक़ात तो कर ले।।
मेरे गाँव के हवाओं में एक अजब सी ताज़गी है।
आ करके देख तो वहाँ की दुनियाँ कितनी हँशी है।
मैं फिर भी सब छोड़ चला आऊंगा तेरी दुनियाँ में।
एक बार मेरे आँगन की मिट्टी से तु मुलाक़ात तो कर ले।।

                 दिनाँक 10 जुलाई 2021   समय  10.30 सुबह
                                                  रचना (लेखक)
                                                सागर (गोरखपुरी)



शनिवार, 3 जुलाई 2021

जुलाई 03, 2021

मुक़द्दर में होगा आसमां | Poem on destiny | भाग्य पर कविता | हिंदी कविता मुक़द्दर | तक़दीर पर कविता | इरादों पर हिंदी कविता |

                                     मुक़द्दर

जब मिलना हो कुछ भी तक़दीर में ।
तो बहाने मिल ही जातें है।
शोहरत दिखती हो हाथों की लकीरों में।
तो काफिले बन ही जातें है।
लाख भटक जाओ ज़िन्दगी की राहों में।
मुक़द्दर में होगा आसमां तो रास्ते बन ही जयेंगे।।

दिल में हौसला और जूनून रखिये।
ख़्वाब छोटे नही कुछ बड़े सोचिए।
क्या फर्क पड़ता है जो मुश्किलें हैं मंजिलों के दरमियां।
मुक़द्दर में होगा आसमां तो रास्ते बन ही जयेंगे।।
कभी पिछड़ने या हार जाने से मत घबराइए।
उठिये और मंज़िल की तरफ दौड़ जाईये।
अपने हौशले को बिखरने और टूटने मत दीजिये।
मुक़द्दर में होगा आसमां तो रास्ते बन ही जयेंगे।।

यहाँ कोई किसी का नही सभी अजनबी हैं।
क्यूँ घबराते हो लोगों से सभी तेरी तरह ही है।
ये भी कोसते है हर वक़्त अपनी तकदीर को।
मुक़द्दर में होगा आसमां तो रास्ते बन ही जयेंगे।।
मुश्किलें आती हैं अच्छे वक़्त का इंतेजार कीजिये।
ख्वाबों के उड़ान को यूँ ही बेवजह मत रोकिये।
उठिये और चल दीजिये अपने सपनो की ओर।
मुक़द्दर में होगा आसमां तो रास्ते बन ही जयेंगे।।

                दिनाँक  02 जुलाई 2021     समय 11.40 सुबह
                                                  रचना (लेखक)
                                                सागर (गोरखपुरी)

गुरुवार, 24 जून 2021

जून 24, 2021

ठहर जाते | पिता पर कविता | पिता पर हिंदी कविता | Poem on Father | पिता पर सुंदर कविता |

                                     ठहर जाते

तेरे बांहों में मैं कभी झूल लिया करता था।
लिपटकर छाती से माथा चुम लिया करता था।
क्यूँ बेवज़ह यूँ ही सब छोड़ चले गये।
ठहर जाते कुछ वक्त तो मुलाक़ात हो जाती।।

कुछ कहना था तुझसे जो बात मेरे दिल में थी।
तेरे बैगैर इकपल कहाँ मेरी सांसें चलती थी।
तू नही है पर महसूस हर वक़्त होता है।
ठहर जाते कुछ वक़्त तो मुलाक़ात हो जाती।।
दिल दुखता है कि उस वक़्त मैं क्यूँ नही था।
तू इतना परेशान है मैं जान क्यूँ नहीं पाया था।
तेरे बिना मैं कितना अकेला सा हो गया हूँ।
ठहर जाते कुछ वक़्त तो मुलाक़ात हो जाती।।

बचपन की याद अब तो बस ख्याल में ही रह गयी।
कुछ बचा नही इन हाथों में बस खाक रह गयी।
तुझ बिन घर अब बड़ा सुना सा लगता है।
ठहर जाते कुछ वक्त तो मुलाक़ात हो जाती।।
तेरे बिना आंगन भी अब तो बेगाना सा लगता है।
खाली कमरा तेरा अब काटने को दौड़ता है।
अब तो सिर्फ यादें तेरी दिन रात आया करती है।
ठहर जाते कुछ वक्त तो मुलाक़ात हो जाती।।

तेरे छड़ी की वो टक टक की आवाज घर में गूंजती है।
हर पल तेरे चलने फिरने की आहट आया करती है।
मां की हालत भी अब तो कुछ ठीक नही लगती।
ठहर जाते कुछ वक्त तो मुलाक़ात हो जाती।।

                  दिनाँक  22 जून 2021    समय  8.00 सुबह
                                                    रचना (लेखक)
                                                  सागर (गोरखपुरी)




शनिवार, 12 जून 2021

जून 12, 2021

गलतफैमिनयाँ शायरी | हिंदी शायरी एक पैग़ाम | लव शायरी | शायरी /सागर गोरखपुरी | image with shayari | pyaar wali shayari| |

                         अनकही बातें

गतफैमियाँ थी हम दोनों के दरमिंयाँ।
पर किसी ने किसी को जबाब न दिया।
बात हमने कभी की ही नही ।
एक दूसरे को दोषी मान लिया।।

       दिनाँक 20 दिसंबर 2020     समय 08.00 सुबह

                                           लेखक
                                  सागर (गोरखपुरी)

जून 12, 2021

एक पैग़ाम | हिंदी शायरी एक पैग़ाम | लव शायरी | शायरी /सागर गोरखपुरी | image with shayari | pyaar wali shayari| |

                               अनकही बातें

एक पैगाम से शुरू हुआ था हमारा ये सफर।
गुस्ताखियों से इसे हमने खत्म  किया।
असर तो देखिए इस तकरार का जनाब।
वो ट्यूटर पर मशगूल हुए।
 मैं नज़्म लिखता चला गया।।
      
           दिनाँक 20 दिसंबर 2020  समय  11.00 रात

                                            लेखक
                                   सागर (गोरखपुरी)
               



सोमवार, 24 मई 2021

मई 24, 2021

क्यूँ छोड़ देते हो उन्हें | Poem on Why leave them | कविता बृद्धाश्रम | बृद्धाश्रम/ सागर गोरखपुरी | बृद्धाश्रम पर कविता | माता पिता पर कविता | हिंदी कविता बृद्धाश्रम |

                               क्यूँ छोड़ देते हो

किसी दूसरे की चौखट पर क्यों छोड़ आते हो उन्हें।
दर दर भटकता,भूख मार देते हो क्यूँ उन्हें।
अपनी खुशियों की खातिर क्यूँ बांट लेते हो महीनों में उन्हें।
बुढ़ापे में तन्हा क्यूँ छोड़ देते हो उन्हें।।

कभी फुर्शत में बैठकर उनका हाल तो पूछ लो।
कोई गिला है उनको तुमसे, कभी ये तो जान लो।
बचपन में जिनकी उंगलिया सहारा हुआ करती थी।
बुढ़ापे में तन्हा क्यूँ छोड़ देते हो उन्हें।।
क्या देखा नही तुमने कभी उनके कांपते हाथों।
चेहरे की झुर्रियां क्या तुम्हें नज़र आती नही।
क्यूँ चले आते हो मंदिरों के बाहर इन्हें बिठाकर।
बुढ़ापे में तन्हा क्यूँ छोड़ देते हो उन्हें।।

भूखे प्यासे रहकर जो तुम्हे ज़िंदा रखतें हैं।
आंखों में बिलखते आँशु लिए बृद्धाश्रम में मिलतें हैं।
जिनकी छाओं में तुम्हारा जीवन बीत जाता है।
बुढ़ापे में तन्हा क्यूँ छोड़ देते हो उन्हें।।
माथे की शिकन, कमज़ोर नजर, बूढा और लाचार बदन।
इस हाल में उनके अपने, एक तुम ही तो हो। 
फिर क्यूँ कर देते हो उनके बर्तन भी अलग।
कैसा मन है तुम्हारा, तुम क्या हो गए हो
ये सोच के मैं भी डर जाता हूँ।।

ये दिल है तुम्हारा या कोई पत्थर।
बुढ़ापे में तन्हा क्यूँ छोड़ देते हो उन्हें।।

                दिनाँक- 18 मई 2021    समय-5.00 शाम
                                                    रचना(लेखक)
                                                 सागर (गोरखपुरी)

रविवार, 9 मई 2021

मई 09, 2021

फुटपाथ | हिंदी कविता | POEM ON Sidewalk | फुटपाथ/सागर गोरखपुरी | फुटपाथ पर कविता | कविता ज़िन्दगी फुटपाथ की | फुटपाथ से फलक तक कविता |

                                       फुटपाथ

बड़ी अजीब है ये दुनिया जो फुटपाथों पर गुजरती है।
यहाँ कोई नही अपना रातें भी अजनबी सी कटती है।
हम थक्कर सो जातें है रातों को इसकी बाहों में ।
यहाँ सभी गैर हैं हमदर्द कोई अपना मिलता नही हैं।।

दिन भर यहां उथल पुथल सी ज़िंदगी होती है।
हर रोज यहाँ भूखे लोगों की लाश मिलती है।
हर किनारे पर कोई ना कोई ख्वाब सँजोए बैठा है।
कितनी जिल्लत और मुसीबत भरी रात यहाँ कटती है।।
वस्त्रहीन बेजान शरीर भूखा और नंगा बदन।
तप रहा है धूप में जल रहा है पूरा जिश्म।
सपने सारे खाक हो गयें मंज़िले कारवां भी छूट गया।
हार गया मैं खुद से ही, अब तो फुटपाथ ही मेरा घर बन गया।।

यहां हर किसी की अपनी एक कहानी है।
ना कोई राजा है ना कोई ना रानी है।
कोई घर से भाग आया है ख्वाबों का जहां तलाशने।
कोई बिना ख्वाबों के ही यहां उम्मीद लगाए बैठा है।।
भूख और भूखेपन से दोस्ती सी हो गयी है।
फुटपाथ पर यूँ ही ज़िन्दगी कहीं गुम हो गयी है।
चले थे घर से जब दिल में अरमान और उम्मीद लिए।
सोच ना था इन्ही फुटपाथों पर ज़िन्दगी यूँ ही बसर होगी।।

बड़ी अजीब है ये दुनिया जो फुटपाथों पर गुजरती है।
यहाँ कोई नही अपना रातें भी अजनबी सी कटती है।।

                दिनाँक 08 मई 2021       समय 04.45 शाम
                                               रचना(लेखक)
                                            सागर (गोरखपुरी)

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

अप्रैल 24, 2021

कोरोना पर कविता : घर से बाहर | कोरोना पर कविता | कोरोना काल की कविताएं | Poem on corona | covid19 kavita in hindi | कोरोना महामारी: सागर गोरखपुरी

                              घर से बाहर

चल थाम के बैठ जातें है दिलों को।
घबराते नही समझातें है मन को।
कुछ पल के लिए छोड़ देतें हैं घुमना फिरना।
घर के बाहर तो मौत के सौदागर तम्माम बैठें है।।

मसीहा समझते थे जिनको वो हैवान हुए बैठें हैं।
बढ़ते महामारी में वो बईमान हुए बैठें हैं।
हर जगह इंतेक़ाल की दुकानदार खोले बैठें हैं।
घर के बाहर तो मौत के सौदागर तम्माम बैठें है।।
इस बार की हालत पहले से कहीं जादा बत्तर है।
बिलखते लोगों को ना घर और ना ऑक्सीजन मुअस्सर है।
निकाल लेते है बेजान जिस्म से कमबख़्त किडनियां ।
घर के बाहर तो मौत के सौदागर तम्माम बैठें है।।

दोष किसे दें अब तो खुद को ही कोष लेते हैं।
इन सारी परेशानियों को हंस के झेल लेते हैं।
वक़्त नासाज है चलो अपनो का खयाल रखें।
घर के बाहर तो मौत के सौदागर तम्माम बैठें है।।
कभी लगती थी कतारें ए.टी.एम के बाहर।
अब ऑक्सीजन के लिए भी कतार है।
खून की थैलियाँ भी अब तो वांछित नहीं है टैक्स से।
देश की हालत खस्ता और खराब है।।

घर से बाहर मत निकलो सभी।
घर के बाहर तो मौत के सौदागर तम्माम हैं।।


                   दिनाँक  23 अप्रैल 2021  समय  11.00 रात
                                                   रचना(लेखक)
                                                 सागर (गोरखपुरी)

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